ईमान, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज पर टिका है इस्लाम – समाचार पत्रिका

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ईमान, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज पर टिका है इस्लाम

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नीरज तिवारी, लखनऊ

समाचार पत्रिका, ब्यूरो

दुनिया में इस्लाम धर्म की बुनियाद ईमान, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज पर टिकी है। रमज़ान के महीने में इस्लाम की शिक्षाओं पर यह है कि कुरान शरीफ में अल्लाह ने रोज़े के बारे में सूरह बक़रः की आयत 183 में फरमाया है कि ऐ ईमान वालों तुम पर रोज़े रख़ना फर्ज किया गया है जैसे कि तुम से पहली उम्मतों पर भी फर्ज किया गया था ताकि तुम में तक़वे की सि़फत पैदा हो। लिहाज़ा तमाम मुसलमानों पर रमज़ान-उल-मुबारक के पूरे महीने रोजे़ रखने का हुकुम दिया गया और जो भी बग़ैर किसी जायज़ मजबूरी के रमज़ान-उल-मुबारक का एक रोज़ा भी छोड़ दे तो वह बहुत ही सख़़त गुनहगार होगा और फिर रमजान-उल-मुबारक के अलावा वह शख्स चाहे दूसरे महीने में रोज़े रखता रहेे उसको वह सवाब और बरकतें हासिल नहीं होगी। अल्लाह के नबी हज़रत मोहम्मद साहब ने एक हदीस में इरशाद फरमाया है कि जो शख़स बिना किसी मजबूरी और बीमारी के रमज़ान का एक रोज़ा भी छोड़ दे वह अगर इस के बदले सारी उम्र भी रोज़ा रखे तो उस का पूरा हक़ अदा न हो सकेगा। एक रोज़ेदार अल्लाह के वास्ते अपनी ख्वाहिशों और लज़्ज़तों को कुर्बान करता है इसलिए अल्लाह ने इसका सवाब भी सबसे निराला और बहुत ज़ियादा रखा है।रोज़ेदार को अल्लाह अपनी बरकतों और रहमतों से मालामाल करता है जैसा कि एक हदीस में अल्लाह के नबी का फरमान है कि रोज़ेदार के लिए खुद रोज़ा अल्लाह से सिफारिश करेगा कि मेरी वज़ह से इस बन्दे ने दिन को ख़ाना पीना और ख़्वाहिशे नफ्स को छोड़ा था इसलिए इस को बख़्श दिया जाये और इसको पूरा इनाम दिया जाये तो अल्लाह रोज़े की ये सिफारिश कुबूल फरमा लेगा। रोज़े का एक ख़ास फायदा ये है कि इसकी वज़ह से रोज़ेदार में तक़वा (अल्लाह का डर) और परहेज़गारी की खूबी पैदा होती है और अपने ख़्वाहिशात पर क़ाबू पाने की ताकत आती है और रूह की तरक़्की और तरबियत होती है लेकिन ये ताक़त उसी वक़्त हासिल होती है जब कि रोज़ेदार खाने पीने के अलावा उन तमाम बातों से अपने आप को दूर रखे जिनसे दूर रहने का हुक्म अल्लाह और उसके रसूल ने दिया है जैसे झूट ना बोले, किसी की बुराई ना करे, किसी से लड़ायी झगड़ा न करे, ना ही किसी इन्सान को अपनी ज़ात से तकलीफ पहँचाये, कोई भी किसी भी तरह का गुनाह ना करे। जैसा कि बहुत सी हदीसों में हुकुम दिया गया है। एक हदीस शरीफ में आता है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाह ने इरशाद फरमाया कि जब तुम में से किसी के रोज़े का दिन हो तो उसकोे चाहिए कि कोई भी गन्दी और बुरी बात अपनी ज़बान से ना निकाले और शोर शराबा भी न करे और अगर कोई आदमी उससे झगड़ा करे और उसको गालियाँ दे तो उस से ये कह दे कि मै रोज़े से हूँ इस लिए तुम्हारी गालियों के ज़वाब में भी मै गाली नहीं दे सकता।इसी तरह अगर कोई इन्सान रोज़े तो रखे लेकिन झूठ भी बोले, गाली भी दे, दूसरे इन्सानों को तकलीफ भी पहुंचाये तो उसका ये रोज़ा उसके कोई काम नहीं आने वाला।

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