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जीवन रक्षक दवाओं पर लगा कालाबाजारी का संक्रमण, मरीज और परिजनों को छल रहे ड्रग माफिया

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नीरज तिवारी, लखनऊ

समाचार पत्रिका, ब्यूरो

उत्तर प्रदेश की राजधानी में कोविड संक्रमण का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा है। जहां जनता इस संक्रमण की चपेट में आकर काल के गाल में समा रही है, वही प्रशासनिक व्यवस्था लचर होने का नतीजा है कि दवाइयों का अकाल पड़ गया। जहां कोविड संक्रमण से बीमार मरीजों के इलाज में उपयोग होने वाली दवाइयों के दाम सातवें आसमान पर पहुंच गये। कोविड महामारी से निपटने में जहां एक ओर सरकारी व्यवस्था पंगु नजर आ रही है। वहीं दूसरी ओर कोरोना काल में ज़िन्दगी से जूझ रहे मरीजों को दवा नहीं मिल रही है। दवाइयों के बढ़ते दाम का कारण कालाबाजारियों के अलावा मेडिकल कंपनियां भी मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। क्योंकि पिछले एक पखवाड़े में उत्तर प्रदेश की राजधानी सहित अन्य जिलों और देश के अन्य राज्यों में कोविड की दूसरी लहर ने विकराल रूप धारण कर लिया है और इस बीमारी से मरने वालों का दिन पर दिन नया रिकॉर्ड बना रहा। ऐसे में मुनाफा कमाने वाले जीवन रक्षक दवा और रेमडेसिविर इंजेक्शन बनाने वाली कंपनियों में दवाएं लेकर जनता को छलने में लग गए हैं।
बताते चलें कि पिछले तीन सप्ताह पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी में रेमडेसिविर इंजेक्शन की बाज़ार कीमत आठ सौ पचास रूपये प्रति इंजेक्शन थी। जनता को बहुत ही आसानी से मिल रहा था। जिसको कंपनियों ने साढ़े तीन हजार से लेकर चौवन सौ रुपये तक कर दिया है। वहीं दूसरी ओर दवा माफियाओं से बाजार से इसे नदारद कर दिया। एक पखवाड़े में स्थित यहां तक पहुंच गयी कि कालाबाजारी इस इंजेक्शन की छह डोस चालीस हजार से लेकर से अस्सी हजार तक बेचा जा रहा है। स्कार्पियो क्लब के मालिक को यही इंजेक्शन कानपुर से पैसठ हजार का मिला। वहीं डालीगंज में आरा मशीन का व्यापार करने वाले के एक रिश्तेदार को एक इंजेक्शन सोलह हजार का पड़ा। ऐसे ही राजधानी सहित पूरे प्रदेश में फेफिफ्लू – फोर हंड्रेड टैबलेट का हाल है कि ग्यारह सौ रुपये की दवाई पांच हजार से लेकर आठ हजार रूपये तक बिक रही है। कोरोना महामारी की चपेट में आने वाले मरीजों के इलाज में उपयोग होने वाली एक अन्य दवा आईवरमेक्टिन आट्ठारह रूपये का पत्ता मिल रहा था। आज स्थिति यह है कि इसकी एक गोली पच्चीस रूपये से लेकर चालीस रुपये तक लखनऊ के मेडिकल स्टोरों पर से बिक रही है।ऑक्सीजन की हालत तो और भी खराब है। दस हजार रूपये से लेकर बीस हजार रूपये तक का ब्लैक हो रहा है। आज इंसान की जिंदगी से ज्यादा पैसे का महत्व है। इंसान ही इंसान को छल रहे है।लोग अपनों की जान बचाने के लिये परेशान हैं और अपनों को मरता देख रहे, लेकिन सरकार आंखे बंद कर बैठ गई है। घरों में आइसोलेट हजारों लोगों को ऑक्सीजन न देने का फरमान सुनाकर जिनका ऑक्सीजन लेबल पचास है जैसे लोगों को मौत की सजा सुना दी गयी है। अब एक-एक ऑक्सीजन सिलेंडर के लिये आधार और डाक्टर का पर्चा जरूरी कर दिया गया है। ऐसे में होम आइसोलेशन में रहने वाले कहा जाये, इसका किसी के पास कोई जवाब नहीं है।

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