डुमरी खुर्द के खलिहान व बगीचे मे पड़ी थी चौरीचौरा कांड की नींव, डुमरी खुर्द गांव के युवा क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिये उठाया बड़ा कदम – समाचार पत्रिका

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डुमरी खुर्द के खलिहान व बगीचे मे पड़ी थी चौरीचौरा कांड की नींव, डुमरी खुर्द गांव के युवा क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिये उठाया बड़ा कदम

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राज अनंत पांडेय,चौरीचौरा

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देश की आजादी के लिए 4 फरवरी 1922 को चौरीचौरा काण्ड हुआ था। जिसमे थाना को फूंकने से पूर्व दर्जनों लोग पुलिस की गोली से शहीद हुए थे। इस बड़े घटनाक्रम ने महात्मा गांधी को विचलित कर दिया और उन्हें अपना असहयोग आंदोलन वापस लेना पड़ा। ऐसे बड़े घटनाक्रम का सबसे बड़ा गवाह डुमरी खुर्द का खलिहान और बगीचा था। वही से रणनीति बनी थी। लेकिन उस गांव पर लोगो की नजर नहीं गई। चौरीचौरा काण्ड से पूर्व विदेशी वस्तुओ व नशाखोरी के खिलाफ लोगो ने एकजुटता दिखाई थी। 1 फरवरी 1922 की शाम को डुमरी खुर्द निवासी शिकारी के घर के पास खलिहान मे भगवान अहिर व उनके दो साथियो को पुलिस द्वारा पीटे जाने को लेकर एक बैठक हुई थी। विदेशी वस्तुओ के बहिष्कार व नशाखोरी के खिलाफ अभियान चलाने के लिए 2 फरवरी 1922 को डुमरी खुर्द के खलिहान मे एक और बैठक हुई।

अलग अलग संगठनो को डुमरी खुर्द के नकछेद ने पांच पत्र लिखे थे और पत्र मे कहा गया था कि अपने साथ 100 से 150 स्वंय सेवको को 4 फरवरी के प्रातःकालीन सभा मे लायेगे। स्वयंसेवको की मिटिंग के लिए विचार विमर्श किया गया। पहले कहा गया कि लाल मुहम्मद के चौरा गांव का टीला ठीक रहेगा। लेकिन लाल मुहम्मद ने कहा कि थाना करीब है और स्वंय सेवको को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इसलिए डुमरी खुर्द के खलिहान मे सभी स्वंयसेवक इकट्ठा हो। 4 फरवरी 1922 को सैकड़ों की संख्या मे लोग इकट्ठा हुए थे। डुमरी खुर्द मे मीटिंग हुई थी ।उसके बाद मुण्डेरा बाजार की ओर गए तभी चौरीचौरा थाने की पुलिस ने उनके ऊपर फायरिंग शुरू कर दी। जिसमे खेलावन भर मारे गए। इसके बाद स्वंय सेवको ने थाने मे आग लगा दी और थाना धू-धू कर जल गया। जिसमे थानेदार गुप्तेश्वर सिंह सहित 23 पुलिसकर्मी मारे गए थे। देश की आजादी के लिए अपने प्राणो की आहुति देने वाले शहीदो को नमन करने के लिए चौरीचौरा काण्ड के 99वी वर्षगांठ पर सरकार शताब्दी वर्ष समारोह मनाने जा रही है। इस शताब्दी वर्ष को राष्ट्रीय कार्यक्रम बनाने की तैयारी हो रही है।

डुमरी खुर्द गांव के लोगो ने जाति धर्म से ऊपर उठकर चौरीचौरा क्रांति में लिया था हिस्सा…

डुमरी खुद गांव के विक्रम अहीर (48), विन्देश्वरी (46), नेऊर (25), अवधी (30), भागीरथी पासी (35), बिहारी पासी (30), चिंनंगी तेली (35), नजरली (30), दुधई चमार (30), गौस अली (40), गोबर्धन पासी (30), जानकी कहार (25), झकरी कहार (34), महाबल जोलहा (38), महावीर (32), महादेव कोहार (24), मंगरु चमार (30), मुन्नी पासी (26), नागेश्वर (25), निफिकिर (25), नारायन कोहार (30), नोहर चमार (34), पांचू कहार (35), पूर्णमासी चमार (28), रामदत्त कहार (28), रामेश्वर पासी (32), राम सरन (30), साधु सरन (40) सहित कुल 32 -35 लोगों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था।

डुमरी खुर्द के एक ही परिवार के तीन लोगों ने लिया था हिस्सा…

चौरीचौरा कांड में डुमरी खुर्द जिसमे विक्रम अहीर को मेरठ जेल में फांसी हुई। इन्ही के भाई विन्देश्वरी को थाने पर चली गोली से मौत हुई और विक्रम अहीर के पुत्र नेउर हाइकोर्ट से छूट गए। इसके अलावा डुमरी खुर्द गांव के रामफल पासी के दो पुत्र मुन्नी व नागेश्वर भी क्रांति में हिस्सा लिए थे। इसी गांव के कुमार और मंगरु भी फंसे थे लेकिन दोनो लोअर कोर्ट से छूट गए थे।

शहीद परिवार के प्रपौत्र शारदानंद ने कही ये बड़ी बात…

शहीद विक्रम अहीर के परिवार के शारदानंद यादव का कहना है कि आजादी की लड़ाई में डुमरी खुर्द गांव का बड़ा योगदान है। चौरीचौरा कांड की पूरी रूपरेखा इसी गांव के खलिहान व कब्रिस्तान की भूमि पर तैयार हुआ था। उस समय वहॉ बागीचा था। इसी गांव में बैठक हुई।

इसी गांव से रणनीति तय करके क्रांतिकारी रेलवे लाइन पकड़ कर चौरीचौरा पहुँचे थे। घटना के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने इसी गांव को निशाना बनाया। अंग्रेजी हुकूमत की प्रताड़ना से महिलाओ को मायके भाग कर जाना पड़ा। पुरुष गांव छोड़ कर फरार हो गए थे। अंग्रेजो ने पशुओ को खूंटा से खोलकर छोड़ दिया था। बड़ी प्रताड़ना झेलने वाले इस क्रांतिकारी गांव का समुचित विकास नही हुआ। गांव के शहीदों का स्मारक बनना चाहिए। गांव के सुंदरीकरण होना चाहिए। गांव के उन परिवारों को सरकारी मदद मिलनी चाहिए जिसके परिजनों ने देश की आजादी के लिए युवावस्था में अपनी जान गंवा दी है। आज शताब्दी वर्ष मनाने की तैयारी जोर-शोर से सरकार कर रही है। इसको लेकर लोगो मे हर्ष है। ऐसे आयोजन से शहीदों व उनके परिवार का मान बढ़ेगा। उनकी मांग है कि सरकार डुमरी खुर्द गांव को भी विकसित करे ताकि शहीद परिवारों का मान बढ़े और प्रदेश व राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके।

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