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अष्टमी विशेष: सुख समृद्धि और आरोग्यता से परिपूर्ण करती हैं महागौरी

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संतोष मणि त्रिपाठी, गोरखपुर
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चैत्र नवरात्रि की अष्टमी को महाअष्टमी या दुर्गाअष्टमी भी कहते हैं। अत्यंत महत्वपूर्ण मानें जाने वाले इस दिन को माता के महागौरी स्वरूप की उपासना की जाती है। मां गौरी का वाहन बैल और अस्त्र त्रिशूल होता है। परम दयालु मां महागौरी कठोर तपस्या कर गौर वर्ण को प्राप्त कर भगवती महागौरी के रूप में विश्व विख्यात हुई। मनोवांछित कामना को पूर्ण करने वाली महागौरी भक्तों को अभय रूप व सौंदर्य प्रदान करते हुए समस्त विष व्याधियों का नाश कर जीवन को सुख समृद्धि और आरोग्यता से परिपूर्ण करती हैं। अष्टमी तिथि परम कल्याणकारी पवित्रता और सुख देने के साथ-साथ धर्म की वृद्धि करती है। भगवती की कृपा से साधक पवित्र और अक्षय पुण्य का अधिकारी हो जाता है। उसे अलौकिक सिद्धियां प्राप्त होती हैं। मां अपने उपासकों की प्रवृत्ति सत्य की ओर प्रेरित कर असत्य का विनाश करती हैं। इसीलिए देव, दानव, राक्षस, नाग, यक्ष, किन्नर और मनुष्य सबके सब अष्टमी को महागौरी को पूजते हैं। कथाओं के अनुसार इस तिथि को मां ने चंड-मुंड नामक असुरों का संहार किया था। इस दिन निर्जला व्रत रहने से बच्चे दीर्घायु होते हैं। सुहागन औरतें अपने अचल सुहाग के लिए मां गौरी को चुनरी चढ़ाती हैं। अष्टमी को कुलदेवी की पूजा के साथ ही मां काली, भद्रकाली, दक्षिण काली और महाकाली की भी आराधना की जाती है। माता महागौरी अन्नपूर्णा की भी रूप हैं, इसलिए इस दिन माता अन्नपूर्णा की पूजा के साथ ही कन्याभोज और ब्राह्मणभोज भी कराया जाता है। अष्टमी के दिन नारियल खाने से बुद्धि का नाश होता है। इसलिए इसका निषेध है। महाअष्टमी के दिन महास्नान के बाद मां दुर्गा का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। महाअष्टमी के दिन मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। इसलिए इस दिन मिट्टी के 9 कलश रखे जाते हैं और देवी दुर्गा के नौ रूपों का ध्यान कर उनका आह्वान किया जाता है। इस दिन कुमारी पूजा भी की जाती है। जिसमें अविवाहित लड़की या छोटी बालिका का श्रृंगार कर देवी दुर्गा की तरह उनकी आराधना की जाती है।

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